छोड़ के मुझको यहां अकेला, कहाँ अचानक चली गयी

छोड़ के मुझको यहां अकेला, कहाँ अचानक चली गयी

रहती थी वो साथ में मेरे, जाने वो किस गली गयी
जीवन की इस बगिया में, क्यों छोड़ के मुझको चली गयी
इक माँ थी जो सब मानती थी, इक माँ थी जो सब जानती थी
छोड़ के मुझको यहां अकेला, कहाँ अचानक चली गयी

माँ की मुझको याद सताए, ना वो अपने पास बुलाये
बहुत रो रहा मन ये मेरा, ना वो अपनी गोद सुलाए
कहीं दिखाई अब ना देती, धुप अचानक चली गयी
इक माँ थी जो सब मानती थी, इक माँ थी जो सब जानती थी
छोड़ के मुझको यहां अकेला, कहाँ अचानक चली गयी

वो कहती थी तुम नाम करोगे, सबका तुम ही ध्यान रखोगे
जो खुशियां हर पल सबको बांटे, ऐसा तुम ही ज्ञान रखोगे
मुझको सारी खुशियां देकर, ममता देकर चली गयी
इक माँ थी जो सब मानती थी, इक माँ थी जो सब जानती थी
छोड़ के मुझको यहां अकेला, कहाँ अचानक चली गयी

अभिमन्यु को सब आज बचाओ

अभिमन्यु को सब आज बचाओ
शुरू हो गया प्रजातंत्र में, कुरुक्षेत्र का युद्ध ये देखो
सारे कौरव पीछे पड़ गए, अभिमन्यु के विरुद्ध ये देखो
कौन बचाए अभिमन्यु को, कोई उसको व्यूह बताओ
देश की खातिर शहर में अपने, अर्जुन को तुम आज जगाओ
 
अर्जुन देखो आज रो रहा, अपनों की इस पीड़ा में
अपनों में वो आज खो गया, वक़्त बिताए क्रीड़ा में
सब कुछ छोड़छाड़ कर अब तुम, अभिमन्यु की जान बचाओ
देश की खातिर शहर में अपने, अर्जुन को तुम आज जगाओ
 
धर्म मार्ग पर चलने को, कृष्ण हमे निर्देश दे रहे
धनुष उठाओ उनपर अब तो, जो हमको सब द्वेष दे रहे
मुश्किल लगता हर पल तुमको, ऐसा अब तुम कदम उठाओ
देश की खातिर शहर में अपने, अर्जुन को तुम आज जगाओ
 
– पुनीत वर्मा की कलम से, मिशन ग्रीन दिल्ली
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