ऑटो रिक्शा भाग रहा है

Puneet VermaBy on October 30, 2014

autoमिशन ग्रीन की कविता सुनकर, देखो ग्राहक जाग रहा है
बढ़ती इस महंगाई में, थोड़ी राहत मांग रहा है
घर को हम तो लेट हो रहे, महंगे उसके रेट हो रहे
दिल्ली की इन् सड़कों पर जो, ऑटो रिक्शा भाग रहा है

दिल्ली की हम सैर करें अब, छोले चख लें नागपाल के
ऑडियन का पान चबा कर, राउंड लगा लें सिटी वाक के
दरिया गंज का चिकन चंगेजी, ढाबे वाला टांग रहा है
घर को हम तो लेट हो रहे, महंगे उसके रेट हो रहे
दिल्ली की इन् सड़कों पर जो, ऑटो रिक्शा भाग रहा है

इंडिया गेट की सैर कर रहे, चूस रहे हैं हम तो चुस्की
बिल्ले जी की लस्सी पीकर, पड़ी रह गयी घर में व्हिस्की
शहर को अपने साफ़ कर रहा, देखो इंडिया जाग रहा है
घर को हम तो लेट हो रहे, महंगे उसके रेट हो रहे
दिल्ली की इन् सड़कों पर जो, ऑटो रिक्शा भाग रहा है

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आज दिवाली आई है

Puneet VermaBy on October 22, 2014

चम चम करती उषा में, टूटा सबका दिल जुड़ रहा
बच्चों थोड़ा बचकर खेलो, पटाखों का धुंआ उड़ रहा
शहर में अपने दीप जल रहे, घर घर खुशियाँ लाइ है
जल्दी से हम पूजा कर लें , आज दिवाली आई है

लड्डुओं का भोग लगाकर, गणपति को प्यार जताकर
पंडित जी को भूख लग गयी, सबको गीता सार सुनाकर
लक्ष्मी जी के चरणों में , माँ ने आरती गाई है
जल्दी से हम पूजा कर लें , आज दिवाली आई है

बेच रहे हैं नकली मीठा, देखो उल्टा काम कर रहे
धोखा देकर लाला जी, देखो मदिरा पान कर रहे
स्वीट्स बेचकर लाला जी ने, कर ली खूब कमाई है
जल्दी से हम पूजा कर लें , आज दिवाली आई है

मिशन ग्रीन की कविता लिखकर, दुखी हो रहा अपना ये चित्त
पटाखों का धुंआ उड़ाकर , शहर हो रहा हर पल दूषित
देखो ध्वनि प्रदुषण में, दिल्ली आज समाई है
जल्दी से हम पूजा कर लें , आज दिवाली आई है

पुनीत वर्मा की कलम से – मिशन ग्रीन दिल्ली

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विजय लालसा भस्म हो गयी

Puneet VermaBy on October 17, 2014

क्रोध भावना खत्म हो रही, मिशन ग्रीन का छंद है ऐसा
पल पल मुझको रोक रहा है, मन का मेरे द्वन्द है ऐसा
ग्रीन टेक की कविताओं से, देखो प्रारम्भ रस्म हो गयी
चिंता चिंतन आज बन गयी, विजय लालसा भस्म हो गयी

ज्ञान का सूरज उदय हुआ अब, बारिश कर दी मौला जी ने
रफ़ी साहब का फिर वो गाना, सुना दिया बडोला जी ने
अनमोल शायरी बरस रही है, रात हमारी जश्न हो गयी
चिंता चिंतन आज बन गयी, विजय लालसा भस्म हो गयी

कविताओं की महफ़िल में, इच्छाओं का नाश हुआ है
निधिवान ये हृदय हुआ अब, तृष्णा का विनाश हुआ है
अंशुमन से भर गयी उषा, दृद्द हमारी कसम हो गयी
चिंता चिंतन आज बन गयी, विजय लालसा भस्म हो गयी

मिशन ग्रीन की एक पल्लवी, हम सब डालें कविताओं में
जसप्रीत हमारा मन हो जाए, कृष्ण प्रीत की सविताओं में
रुचित हमारा छंद हो गया, कविता अपनी स्वस्थ हो गयी
चिंता चिंतन आज बन गयी, विजय लालसा भस्म हो गयी

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