विजय लालसा भस्म हो गयी

Puneet VermaBy on October 17, 2014

क्रोध भावना खत्म हो रही, मिशन ग्रीन का छंद है ऐसा
पल पल मुझको रोक रहा है, मन का मेरे द्वन्द है ऐसा
ग्रीन टेक की कविताओं से, देखो प्रारम्भ रस्म हो गयी
चिंता चिंतन आज बन गयी, विजय लालसा भस्म हो गयी

ज्ञान का सूरज उदय हुआ अब, बारिश कर दी मौला जी ने
रफ़ी साहब का फिर वो गाना, सुना दिया बडोला जी ने
अनमोल शायरी बरस रही है, रात हमारी जश्न हो गयी
चिंता चिंतन आज बन गयी, विजय लालसा भस्म हो गयी

कविताओं की महफ़िल में, इच्छाओं का नाश हुआ है
निधिवान ये हृदय हुआ अब, तृष्णा का विनाश हुआ है
अंशुमन से भर गयी उषा, दृद्द हमारी कसम हो गयी
चिंता चिंतन आज बन गयी, विजय लालसा भस्म हो गयी

मिशन ग्रीन की एक पल्लवी, हम सब डालें कविताओं में
जसप्रीत हमारा मन हो जाए, कृष्ण प्रीत की सविताओं में
रुचित हमारा छंद हो गया, कविता अपनी स्वस्थ हो गयी
चिंता चिंतन आज बन गयी, विजय लालसा भस्म हो गयी

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बॉस से मुझको आज बचाए, वही बहाना सोच रहा हूँ

Puneet VermaBy on October 11, 2014

मस्त भरे इस मौसम में, जल्दी उठना  क्राइम हो गया
योगा करना भूल गया मैं,ऑफिस का अब टाइम हो गया
ट्राफिक के इस दल दल में, बालों को मैं नोच रहा हूँ
बॉस से मुझको आज बचाए, वही बहाना सोच रहा हूँ

चाहे ऑफिस जल्दी जाऊं, चाहे जाऊं मैं देर से
शार्ट रुट से दौड़ लगाऊँ, पहुंचु फिर भी मैं देर से
भाग रहा हूँ ऑफिस जैसे, मिल्खा सिंग का कोच रहा हूँ
ट्राफिक के इस दल दल में, बालों को मैं नोच रहा हूँ
बॉस से मुझको आज बचाए, वही बहाना सोच रहा हूँ

सोते सोते बिस्तर में, मॉर्निंग वाक का प्लान बनाया
रीट्वीट कराकर लोगों को, ग्रीन ब्लॉग का फैन बनाया
अपने को में बॉस मानकर, दुनिआ को मैं कोस रहा हूँ
ट्राफिक के इस दल दल में, बालों को मैं नोच रहा हूँ
बॉस से मुझको आज बचाए, वही बहाना सोच रहा हूँ

पानी गिर गया मुख पर मेरे, पानी फिर गया ग्रीन ड्रीम पर
सोने में फिर लेट हो गया, कविता लिखकर मिशन ग्रीन पर
ग्रीन टेक के प्याले में, देखो पी मैं स्कॉच रहा हूँ
ट्राफिक के इस दल दल में, बालों को मैं नोच रहा हूँ
बॉस से मुझको आज बचाए, वही बहाना सोच रहा हूँ

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पल पल बढ़ती इच्छाओं की, बीन बजाना भूल गए

Puneet VermaBy on September 24, 2014

बुद्धा और अशोका जैसे, योद्धाओं का देश है भारत
गीता और रामायण जैसी ,कविताओं का देश है भारत
योद्धा ये तो मन से लड़कर, तीर चलाना भूल गए
पल पल बढ़ती इच्छाओं की, बीन बजाना भूल गए

बृढ़रथ सारे खत्म हुए जब, प्रद्योता का राज था आया
प्रद्योता भी खत्म हुआ जब, शिशुनाग का काज था आया
नन्द वंश के अंतिम राजा, राज चलाना भूल गए
पल पल बढ़ती इच्छाओं की, बीन बजाना भूल गए

सिकंदर को मित्र बनाकर, नन्द वंश का नाश हुआ जब
चाणकय की बात मानकर, चन्द्रगुप्त भी ख़ास हुआ जब
जैन धर्म को गले लगाकर, चन्द्रगुप्त भी झूल गए
पल पल बढ़ती इच्छाओं की, बीन बजाना भूल गए

चंगेज खान का नाम बढ़ाया, चीन में युआनों ने
भारत में भी नाम बढ़ाया, बाबर के बलवानों ने
बाबर बेग जब भारत आया, सांगा के बुलाने पर
लोधी वंश का नाश हुआ तब, दिल्ली के ठिकाने पर
अकबर की हिम्मत के आगे, राणा प्रताप भी झूल गए
पल पल बढ़ती इच्छाओं की, बीन बजाना भूल गए

भारत में जब मुगलों का, औरंगजेब ने नाम बनाया
देश में अपने संधि करके, अंग्रेजों ने काम बनाया
बहादुर शाह भूटान में जाकर, तीर चलाना भूल गए
पल पल बढ़ती इच्छाओं की, बीन बजाना भूल गए

तीर चलाना काम ना आया, बीन बजाना काम ना आया
शान्ति राह पर आगे बढ़कर, हिंसक होना काम ना आया
कृष्ण राम की कविता पड़कर, कविता लिखना भूल गए
पल पल बढ़ती इच्छाओं की, बीन बजाना भूल गए

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