माँ होती तो क्या होता

Puneet VermaBy on January 10, 2015

रहता हूँ मैं , अपनों में बेगाना बनकर
रोता हूँ मैं, सपनो में रोजाना जमकर
जलती इस धूप में, छाँव होती तो क्या होता
नकली इस भेस में, जीवन की इस रेस में
इस बेगाने देश में, माँ होती तो क्या होता

प्यासा हूँ मैं, नदियों के इस देश में
डूब रहा हूँ आज, मन के इस द्वेष में
यहां मीठे पानी की, बां होती तो क्या होता
नकली इस भेस में, जीवन की इस रेस में
इस बेगाने देश में, माँ होती तो क्या होता

खुली इस पवन में, मन ये घुटता है
झूठी इस चाह मैं, दिन ये लूटता है
गाँव की उस झील की, नाव होती तो क्या होता
नकली इस भेस में, जीवन की इस रेस में
इस बेगाने देश में, माँ होती तो क्या होता

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दीदार बस इक शज़र का, बाकी रह गया

Puneet VermaBy on December 7, 2014

सब्ज़ इ मुहीम के जाम में , ये साकी बह गया
कोई ख़्वाब था मन में मेरे, जो बाकी रह गया
छा गए आसमा में जबसे, उल्फत के बादल
दीदार बस इक शज़र का, बाकी रह गया

दिल्ली की जमीन को, रुस्वा मत करना कभी
बिगाड़ रहे इस जन्नत को, मत उनसे डरना कभी
रूमानी हो मौसम इसका, रिवाज वो कायम करना
निकले बस सोना इससे, इस मिट्टी को मुलायम करना

अल्फ़ाज़ों में ग्रीन टेक हो, जिगर में ग्रीन टेक हो
मोटी उन हसीनाओं की, फिगर में ग्रीन टेक हो
फुरकत हो इस चर्बी से, शुगर में ग्रीन टेक हो
शब इ बिमारी रुक्सत हो, शहर में ग्रीन टेक हो

वर्मा की कलम को, शर्म सार मत करना तुम
परवाज़ मिशन ग्रीन की, कैच अभी बस करना तुम
ख्वाब शब ए कुदरत का, बाकी बस रह गया
दीदार बस इक शज़र का, बाकी बस रह गया

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