From Jungle to Ram Rajya

किसी ने सच कहा है की शेर जंगल का राजा होता है.  अगर हम अपनी दुनिया को जंगल बना देते हैं तो उस जीवन के रखवाले यानी हम, एक जानवर के समान हो जाते हैं. जंगल का अर्थ है वो जगह जहां एक प्राणी दुसरे प्राणी से डर कर भाग रहा है और दूसरा अपनी भूख मिटाने के लिए उसका पीछा कर रहा है. यानी जो डर कर भाग रहा है वो भी जानवर के समान है और जो डरा रहा है वो भी जानवर के समान है. हमे कभी भी जंगल में कोई प्राणी किसी  दुसरे प्राणी की रक्षा करता हुआ नहीं मिलेगा. आज हमारा शहर एक जंगल की तरह बनता जा रहा है, जो की कभी राम राज्य हुआ करता था. आज के इस चमकते जंगल में प्राणी वो  जानवर बन गया है जो अपनी इंसानी समझ का इस्तेमाल जानवर रूपी कार्यों को पूरा करने के लिए कर रहा है. और अतीत गवाह है की जब जब ऐसा जंगल बना है, तब तब राम अपना राज्य छोड़कर इस जंगल की तरफ बड़े हैं और उन्होंने फिर से इस जंगल को राम राज्य में बदला है. और ऐसे जंगल में कुछ लोग अर्जुन के सामान सत्य के लिए युद्ध लड़ रहे है. लेकिन युद्ध में जब वो अपनों को देखते हैं तो शांत और निराश हो कर बैठ जाते हैं. और फिर जब ऐसा होता है तो परम परमेश्वर कृष्ण आकर अर्जुन को रथ पर बिठा कर सारथि बन जाते हैं और अपनी चतुराई से उसको राम राज्य की तरफ अग्रसर करते हैं. और ऐसे जंगल में राम को अपनी सेना की आवश्यकता नहीं पड़ती और कृष्ण को अपने सुदर्शन चक्र की आवशयकता नहीं पड़ती. वो केवल बनवासी और सारथि के रूप में ही विश्व को बदल देते हैं. आज के इस जंगल में शेर बहुत चतुर हो गया है और अपनी भूख मिटाने के लिए शिकार का समान करता है. अगर समान से भी शिकार नहीं मानता तो वो दंड का इस्तेमाल करता है. अगर दंड से भी शिकार पर कोई असर नहीं पड़ता तो वो उसको पुरस्कार से ललचाता है. और अगर पुरस्कार से उसका  काम ना बने तो वो भ्रम का सहारा लेकर अपने शिकार को चमकीले सपने दिखाता है. अगर शिकार भ्रम में नहीं फंसता तो वो विभाजन कला का सहारा लेता है. और अपनी भूख मिटाने के लिए शिकार को जात पात और धर्म  के नाम पर , लिंग के नाम पर , देशों और राज्यों के नाम पर , जीवनशैली के नाम पर कमजोर बनाता है. और फिर भी शिकार उसके पंजों में नहीं फंसता तो वो उसकी उपेक्षा कर के अपना ध्यान हटाने का ढोंग करता है और अन्तं में जब उसको सफलता नहीं मिलती तो वो शिकार की कमजोरिओं और सेना शक्ति को अपने बस में करता है और अपनी भूख शांत करता है. लेकिन बहुत कम लोग होते हैं जो चाणक्य की तरह इस चक्र्वुह को  समझ पाते हैं. और जिनको थोडा बहुत इस चक्र्वुह का ज्ञान हो जाता है, वो अभिमन्यु की तरह लड़ते हैं और और अपना बलिदान दे देते हैं. और जो राम और कृष्ण की  शिक्षा को साथ लेकर चलता है,  वो इस जंगल को राम राज्य में बदल पाता है.

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Puneet Verma
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