Jhatak di Geeli Chunar

झटक दी गीली चूनर
अल्हडपन से

कुछ बूंदें
हज़ार टुकड़ों में
बिखर गईं

ठंडी फुहारों सी
चेहरे को छू कर
कुछ यादें बन कर
ज़ेहन को पार कर

हौले से
उतरती गईं
गहराइयों में
दिल की

चूनर तो सूख गई
सूखनी ही थी
पर
उठी जो लहर उसकी सरसराहट
छप गई
उम्रों के लिए

लहरों में खिले रंग
सराबोर रखते हैं
अब भी

रंगों लहरों गीलेपन की थरथराहट से
कम्पित है तरंगित है
अंग प्रत्यंग
झंकृत मधुर सुवासित
वो चूनर की
मुस्कुराहट

Facebook Comments

mm
Bhupesh Khatri Ji is hindi and urdu poet who belongs to Allahabad. He works as Deputy Director (software) at IGNOU, New Delhi.
What are you looking for ?


Your Email

Let us know your need

×
Connect with Us

Your Name (required)

Your Email (required)

Your Message


×
Subscribe

×