जिन पेडो को सींचा था, उन्ही पर लाश लटकी थी

मेरे जख्मो की पीडा को, मै ही जान सकता हूँ।
मेरे अपनो पे क्या बीती,मै ये पहचान सकता हूँ।
हजारो लोग है खुदको , बडा हमदर्द कहते है।
हमारा दर्द जो समझे मसीहा मान सकता हूँ।।

उन्होने कर्ज लेकर के ,धरा पर बीज बोया था।
लहू से कर दिया सिंचित, वो रातो को न सोया था।
उस धरती पुत्र की मेहनत, अब सोने सी लहराई।
मिली जब रक्म हाथो मे, तो दिल जोरो से रोया था।।

बहुत थे स्वप्न आखो मे, बहुत सी आस दिल मे थी।
छुडाउंगा जमी अपनी, ये चाहत खास दिल मे थी।
मगर किस्मत तो देखो तुम, हमारे अन्नदाता की।
जिन पेडो को सींचा था, उन्ही पर लाश लटकी थी।

यही हालात तब भी थे, यही हालात अब है।
बहुत लाचार तब भी थे, बहुत लाचार अब भी है।
कृषक के नाम पर इस देश मे, बस योजना बनती।
कोई सरकार तब भी थी, कोई सरकार अब भी है ।।

– गिरीश चन्द्र शर्मा “प्रवासी”

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