जिंदगी की सड़क पर, हम कहाँ आ गए

जिंदगी की सड़क पर, हम कहाँ आ गए
छोड़ के उस वक़्त को, जो बड़ा मासूम था
बरखा में भीगे पत्तों सा, वृक्षों में जो गुम था
उस रस्ते से निकलकर, हम कहाँ आ गए
जिंदगी की सड़क पर, हम कहाँ आ गए

ऐ वक़्त ऐ रहनुमा, करता हूँ मैं इल्तज़ा
चिंतामई  इस युग से अब, वापस मुझको लेकर जा
लड़खड़ाते इन क़दमों से, हम कहाँ आ गए
जिंदगी की सड़क पर, हम कहाँ आ गए

क्यों बिछड़ कर चले गए, सर्जक जो हमारे थे
दिल के नजदीक थे, और बहुत प्यारे थे
लगता नहीं अब कोई अपना, हम जहां आ गए
उस रस्ते से निकलकर, हम कहाँ आ गए

इन् गुंडों को सजा दिलाकर, शहर बचाएं शहर बचाएं

शर्मसार ये शहर हुआ है, टूट गए अब सारे सपने
कैसे देखो काण्ड हो रहे, क्या हो गया शहर को अपने
इन असामाजिक तत्वों को, आओ मिलकर सबक सिखाएं
इन् गुंडों को सजा दिलाकर, शहर बचाएं शहर बचाएं

चोरी करते इन हाथों को, जल्दी से तुम आज मोड़ दो
बंदूके जो आज उठाए, उनके बॉडी पार्ट मोड़ दो
ऐसा सबक सिखाओ इनको, अपना हर्ष ये स्वयं बताएँ
इन् गुंडों को सजा दिलाकर, शहर बचाएं शहर बचाएं

काम करें ना स्वपन में ऐसा, इनको ऐसा पाठ पड़ा दो
बलात्कारी इन् पशुओं को, सूली पर तुम आज चढ़ा दो
ना घर में यूँ चुप चाप बैठकर, अपनी इज़्ज़त आज गवाएं
इन् गुंडों को सजा दिलाकर, शहर बचाएं शहर बचाएं

सबक इन्हे अब तभी मिलेगा, पकड़ो इनके परिवारों को
अहसास दर्द का तभी मिलेगा, चोट लगेगी जब प्यारों को
मूह काला करके बीच सड़क पे, वस्त्रहीन फिर इन्हे भगाएं
इन् गुंडों को सजा दिलाकर, शहर बचाएं शहर बचाएं

पल पल यूँ ही चलता रहता, क्या कहूँ अब क्या है जीवन

हाथ से अपने फिसल रहा जो, समय को अब मैं जकड रहा हूँ
पल पल मुघसे दूर हो रहा, मन को अपने पकड़ रहा हूँ
देख के खिलते फूलों को, भटक रहा है अपना तनमन
पल पल यूँ ही चलता रहता, क्या कहूँ अब क्या है जीवन

इंतज़ार मैं तारों का, देखो हर इक रात कर रहा
मन को अपने साथ बिठाकर, खुद से थोड़ी बात कर रहा
ज्ञान भरी इस नदिया में, हो रहा ये तन मन पावन
पल पल यूँ ही चलता रहता, क्या कहूँ अब क्या है जीवन

कष्ट भरी इस नगरी में, तेरी नजरें मुघे फंसाए
पाप पुण्य की नगरी में, क्यों वापस मुझको तू बुलाए
ग्रीन टेक की कविता पड़कर, आ गया है फिर से सावन
पल पल यूँ ही चलता रहता, क्या कहूँ अब क्या है जीवन