अब से मैं उड़ूंगा, और ये हवा भी मेरा साथ देगी

bird

अनुशासन के मार्ग पर, अब से मैं चलूँगा
दीपक के घी जैसा, अब से मैं ढलूँगा
चमकूँगा सीप की तरह, सूरज की रौशनी भी हाथ देगी
अब से मैं उड़ूंगा, और ये हवा भी मेरा साथ देगी

मोर पंख जैसा रंगीन, मन अपना हो जाएगा
वृक्षों के जैसा ग्रीन, तन अपना हो जाएगा
तारों की चाॅदर अब से , मुघको ये रात देगी
अब से मैं उड़ूंगा, और ये हवा भी मेरा साथ देगी

– पुनीत वर्मा की कलम से, मिशन ग्रीन दिल्ली ब्लॉग

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जिंदगी की सड़क पर, हम कहाँ आ गए

road

जिंदगी की सड़क पर, हम कहाँ आ गए
छोड़ के उस वक़्त को, जो बड़ा मासूम था
बरखा में भीगे पत्तों सा, वृक्षों में जो गुम था
उस रस्ते से निकलकर, हम कहाँ आ गए
जिंदगी की सड़क पर, हम कहाँ आ गए

ऐ वक़्त ऐ रहनुमा, करता हूँ मैं इल्तज़ा
चिंतामई  इस युग से अब, वापस मुझको लेकर जा
लड़खड़ाते इन क़दमों से, हम कहाँ आ गए
जिंदगी की सड़क पर, हम कहाँ आ गए

क्यों बिछड़ कर चले गए, सर्जक जो हमारे थे
दिल के नजदीक थे, और बहुत प्यारे थे
लगता नहीं अब कोई अपना, हम जहां आ गए
उस रस्ते से निकलकर, हम कहाँ आ गए

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इन् गुंडों को सजा दिलाकर, शहर बचाएं शहर बचाएं

woman crying
शर्मसार ये शहर हुआ है, टूट गए अब सारे सपने
कैसे देखो काण्ड हो रहे, क्या हो गया शहर को अपने
इन असामाजिक तत्वों को, आओ मिलकर सबक सिखाएं
इन् गुंडों को सजा दिलाकर, शहर बचाएं शहर बचाएंचोरी करते इन हाथों को, जल्दी से तुम आज मोड़ दो
बंदूके जो आज उठाए, उनके बॉडी पार्ट मोड़ दो
ऐसा सबक सिखाओ इनको, अपना हर्ष ये स्वयं बताएँ
इन् गुंडों को सजा दिलाकर, शहर बचाएं शहर बचाएं

काम करें ना स्वपन में ऐसा, इनको ऐसा पाठ पड़ा दो
बलात्कारी इन् पशुओं को, सूली पर तुम आज चढ़ा दो
ना घर में यूँ चुप चाप बैठकर, अपनी इज़्ज़त आज गवाएं
इन् गुंडों को सजा दिलाकर, शहर बचाएं शहर बचाएं

सबक इन्हे अब तभी मिलेगा, पकड़ो इनके परिवारों को
अहसास दर्द का तभी मिलेगा, चोट लगेगी जब प्यारों को
मूह काला करके बीच सड़क पे, वस्त्रहीन फिर इन्हे भगाएं
इन् गुंडों को सजा दिलाकर, शहर बचाएं शहर बचाएं

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