देखो जल्दी क्या छपा है, दिल्ली की अखबारों में

घुटन भरी इन् कारों में , खो गया हूँ मीनारों में
गर्मी पल पल बड़ रही है, बिजली की इन् तारों में
शहर में अपने क्रोध पल रहा, दिल अचानक क्यों जल रहा
देखो जल्दी क्या छपा है, दिल्ली की अखबारों में

दिल्ली की इस नगरी में , हर ईमारत बड़ रही है
बुरी नजर से डरते डरते, देखो औरत लड़ रही है
धोका खाकर अपनी जनता , खो गयी है नारों में
शहर में अपने क्रोध पल रहा, दिल अचानक क्यों जल रहा
देखो जल्दी क्या छपा है, दिल्ली की अखबारों में

करते करते उसकी पूजा, धन की पूजा शुरू हो गयी
प्रभु रूप थी देख रही जो, देखो नजरें कहाँ खो गयी
शीतलता भी ख़तम हो रही, बारिश की फुहारों में
शहर में अपने क्रोध पल रहा, दिल अचानक क्यों जल रहा
देखो जल्दी क्या छपा है, दिल्ली की अखबारों में

– पुनीत वर्मा की कलम से … greentechdelhi.com

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ग्रीन हमारी सोच कर रहा, ग्रीन ब्लॉग का जादू ऐसा

बारिश में हैं भीग रही जो, जुल्फें वो बेहोश कर रही
काजल में से देख रही जो, आँखें वो मदहोश कर रही
दिल्ली को जो ग्रीन कर रहा, ग्रीन टॉप का जादू ऐसा
ग्रीन हमारी सोच कर रहा, ग्रीन ब्लॉग का जादू ऐसा

हंसी तुम्हारी सुनते सुनते, कोयल कु कु भूल रही अब
होके मस्त बहारों में, डाल व्रक्ष झूल रही अब
ग्रीन ब्लॉग का नाम जप रहा, शहर का अपने साधू ऐसा
ग्रीन हमारी सोच कर रहा, ग्रीन ब्लॉग का जादू ऐसा

चाल तुम्हारी मस्त देख कर, कार भी चलना भूल गयी अब
रोशन भीगी सड़क हुई अब, शाम भी ढलना भूल गयी अब
पैदल चलना सीख रहा अब, शहर का अपने बाबू ऐसा
ग्रीन हमारी सोच कर रहा, ग्रीन ब्लॉग का जादू ऐसा

पुनीत वर्मा की कलम से – मिशन ग्रीन दिल्ली ब्लॉग

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ना जाने क्यों अकेला हूँ

निधि भरे संसार में , इस गहरे आकाश में – ना जाने क्या खोजता हूँ,  इस गहरे आभास में
यादों का जो दरस कराए, बन गया वो मेला हूँ – इस भरी महफ़िल में, ना जाने क्यों अकेला हूँ
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तन्हाई की इस खाई में , चेष्टा पल पल करता हूँ – थोडा ऊपर चढ़ कर आऊं, कोशिश पल पल करता हूँ
रख कर मुघ्को भूल गया जो, उस वादक की बेला हूँ – इस भरी महफ़िल में, ना जाने क्यों अकेला हूँ
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आज अकेले हम सब बैठे, वक़्त साथ में बैठ रहा  है – हलके हलके छलक रहा जो, जाम भी हमसे ऐंठ रहा है
अदृश्य कोण में चमक रही जो, बन गया वो तकिला हूँ – इस भरी महफ़िल में, ना जाने क्यों अकेला हूँ

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