Baikunth Kaun Jaae

जब बैकुंठ स्वयं आए
तो बैकुंठ कौन जाए
कोटि कोटि योनियों के
भृमण से कान्हा खींच के लाए
अब बैकुंठ कौन जाए

बृंदा के वन में
कदम्ब के डारन पर
झूला झूलें सब सखियाँ
काल को दूर भगाए
अब बैकुंठ कौन जाए

कालिंदी के कूलन पर
वृषभान के कांधन पर
हलधर हाथ लगाए
अब बैकुंठ कौन जाए

माखन चोर ने चित को लियो चुराए
मोरपंख सर पर क्या धरयो
स्वर्ण चकित चकराए
बन कर भ्रमर बृंदाबन घूमे
गुंजन चहुं ओर मचाए
अब बैकुंठ कौन जाए

चकित चितवन हेरे चहुं दिस
मन हर्षित उलसित दोऊ दृग नीर बहाए
हस्त जोड़ यह विनय सुनो मुरारी
पीड़ हरो भव पार उतारी
तन मन अर्पण करते जाए
अब बैकुंठ कौन जाए

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Bhupesh Khatri Ji is hindi and urdu poet who belongs to Allahabad. He works as Deputy Director (software) at IGNOU, New Delhi.

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