कार्बन फूट प्रिंट कम हुआ है , ग्रीन हुई है दिल्ली सारी

इंजन को आराम मिला अब, तेल फूकना बंद हो गया – शीतल जल अब घर घर पहुंचा , नदी सूकना बंद हो गया
राम नाम के आने से , आज बुराई फिर है हारी – कार्बन फूट प्रिंट कम हुआ है , ग्रीन हुई है दिल्ली सारी

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बिजली के उपकरणों को, प्यार से हमने आज बुझाया – प्रोपेन के सिलिंडर को, घर पर हमने कम जलाया
कंजेशंन से रिश्ता टूटा, कार पूल से हुई है यारी – राम नाम के आने से , आज बुराई फिर है हारी
कार्बन फूट प्रिंट कम हुआ है , ग्रीन हुई है दिल्ली सारी

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मोबाइल फ़ोन को छुट्टी मिल गयी , इअर फ़ोन से कान बचे अब – करते है बस यही दुआ सब , लैपटॉप से भी जान बचे अब
दारु सिगरेट बेन हुए हैं , सुखी हुई है शहर की नारी – राम नाम के आने से , आज बुराई फिर है हारी
कार्बन फूट प्रिंट कम हुआ है , ग्रीन हुई है दिल्ली सारी

पुनीत वर्मा की कलम से

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मुघ्को आज बुलाया है

मृत्युलोक की रात्री में , मन का ये संघर्ष है कैसा – पल पल मेरा कठिन हो रहा , जीवन का ये वर्ष है कैसा
मेरा हाथ पकड़ के तुमने, रस्ता मुघे दिखाया है – ग्रीन टेक की हरी सतह ने, मुघ्को आज बुलाया है

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एक तरफ कुआँ है दीखता, एक तरफ दिखती है खाई – मन के भीतर सत्य देखकर , खुद से हमने नजर मिलाई
बड़े दिनों के बाद आज फिर , आंसू निकल के आया है – ग्रीन टेक की हरी सतह ने, मुघ्को आज बुलाया है

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परिवेश हुआ है मन का ऐसा, हर पल मैं तो टूट रहा हूँ – बाग़ के खिलते फूलों से, आज अचानक रूठ रहा हूँ
बिछड़ रहे इन् प्राणों को , खुद से आज मिलाया है – ग्रीन टेक की हरी सतह ने, मुघ्को आज बुलाया है

– पुनीत वर्मा की कलम से

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बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे

 

मौसम का अंदाज है बदला, गर्म हवा को छोड़ के पीछे – टिप टिप पानी उस पर बरसा, पीपल है जो मोड़ के पीछे
देखो काली घटा के पीछे, चमक रहा है दिनकर ऐसे – बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे
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बूँद बूँद को मुख से पीती, प्यासी धरती सुखी हुई अब – आसमान को ताक़ रही है, नजर हमारी झुकी हुई अब
वृक्ष के पीले पतों को, तोड़ रहा हो चुनकर जैसे – देखो काली घटा के पीछे, चमक रहा है दिनकर ऐसे
बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे
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पूरब पश्चिम हर दिशा में, आज बजी है कैसी सरगम – दिल्ली की इन् सड़कों पर, कोयल कूक रही है हरदम
क़ुदरत के इन फूलों को , जोड़ रहा हो बुनकर जैसे – देखो काली घटा के पीछे, चमक रहा है दिनकर ऐसे
बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे

By Puneet Verma – puneet6565@gmail.com

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