मुघ्को आज बुलाया है

मृत्युलोक की रात्री में , मन का ये संघर्ष है कैसा – पल पल मेरा कठिन हो रहा , जीवन का ये वर्ष है कैसा
मेरा हाथ पकड़ के तुमने, रस्ता मुघे दिखाया है – ग्रीन टेक की हरी सतह ने, मुघ्को आज बुलाया है

___________________________________________________

एक तरफ कुआँ है दीखता, एक तरफ दिखती है खाई – मन के भीतर सत्य देखकर , खुद से हमने नजर मिलाई
बड़े दिनों के बाद आज फिर , आंसू निकल के आया है – ग्रीन टेक की हरी सतह ने, मुघ्को आज बुलाया है

__________________________________________________

परिवेश हुआ है मन का ऐसा, हर पल मैं तो टूट रहा हूँ – बाग़ के खिलते फूलों से, आज अचानक रूठ रहा हूँ
बिछड़ रहे इन् प्राणों को , खुद से आज मिलाया है – ग्रीन टेक की हरी सतह ने, मुघ्को आज बुलाया है

– पुनीत वर्मा की कलम से

Loading

Colors Worked for Me

हमारा जीवन हर पल किसी ना किसी  चीज़ से प्रभावित होता रहता है. जैसे कभी कभी मुघे रंग प्रभावित करते हैं. अक्सर मुघे हरा रंग अच्छा लगने लगता  है और मैं सोचता हूँ की काश पूरे शहर का कोई कोना ऐसा ना बचे जहां शीतल पेड़ ना हों, हर जगह केवल पेड़ों की ठंडी छाया हो जो हमे सुकून और आराम दे सके, स्वस्थ्य दे सके. बारिश के मौसम में मुझको आकाश का गहरा नीला रंग अच्छा लगता है, जो मुघे अपनी गहराई में लेकर जाता है और मैं उसकी ठंडी घटा में पूरी तरह से डूब जाता हूँ. कभी मुघे कटे हुए आम का पीला रंग अच्छा लगता है और मन उसका आनंद लेने के लिए ललचाता है. कभी लाल रंग का टीका लोगों के मस्तिस्क पे अच्छा लगता है क्योंकि मुघे वो अद्यात्मिक, सच्चे, शांत और ग्यानी प्रतीत होते हैं. कभी कपड़ों का सफ़ेद रंग अच्छा लगता है क्योंकि वो मुघे मन और तन की पवित्रता का आभास करवाता है. काले रंग के आकाश में टिम टिम करते सफ़ेद तारे मुघे अहसास करवाते हैं की मेरे जीवन में मित्रों की कमी नहीं है और में अकेला नहीं हूँ.  सच कहूँ तो रंग मेरी सोच को हर पल बदलते रहते हैं और मेरी सोच मेरे जीवन को मनोरंजक बना देती है.

Loading

बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे

 

मौसम का अंदाज है बदला, गर्म हवा को छोड़ के पीछे – टिप टिप पानी उस पर बरसा, पीपल है जो मोड़ के पीछे
देखो काली घटा के पीछे, चमक रहा है दिनकर ऐसे – बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे
__________________________________________

बूँद बूँद को मुख से पीती, प्यासी धरती सुखी हुई अब – आसमान को ताक़ रही है, नजर हमारी झुकी हुई अब
वृक्ष के पीले पतों को, तोड़ रहा हो चुनकर जैसे – देखो काली घटा के पीछे, चमक रहा है दिनकर ऐसे
बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे
___________________________________________

पूरब पश्चिम हर दिशा में, आज बजी है कैसी सरगम – दिल्ली की इन् सड़कों पर, कोयल कूक रही है हरदम
क़ुदरत के इन फूलों को , जोड़ रहा हो बुनकर जैसे – देखो काली घटा के पीछे, चमक रहा है दिनकर ऐसे
बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे

By Puneet Verma – puneet6565@gmail.com

Loading

What are you looking for ?

    ×
    Connect with Us

      ×
      Subscribe

        ×