Bikher Doonga Mein Laali Jaate Jaate

Bikher Doonga Mein Laali Jaate Jaate

बिखेर दूंगा लाली मैं जाते जाते
बीज से उपजी थी तरुणाई आते आते
हर हाल में वो हाल पूछ लेते हैं आते जाते
बुढ़े बरगद के पत्ते भी हैं हवा से सरसराते
छूट गया साथ वक़्त के दामन को थाम जाते
रंग हथेलियों पे भी हैं कुछ तो छूट जाते
रेशमी डोरियों को यूं ही नहीं दांत से काट पाते
कुछ कट गया कुछ कट जाएगा रोते गाते
सपनों की सांकलों को ऐसे नहीं खड़खड़ाते
रूबरू हो अगर तपाक से गले से तो लगाते
मेरे तो छोड़ अपने कुछ ग़म तो बांट जाते
सन्दल का लेप गुलों से छीन कर चेहरों पे हैं लगाते
लहू क्या तैर गया जीभ पर जो हो लपलपाते
सावन क्या हर दिन बरसेगा जो भीग जाते
रहबरों की न थी किस्मत हम सी
मिला न कुछ यां पर जो लूट जाते
रह रह कर कैसे कैसे गीत तुम रहे गुनगुनाते
चश्म हो रही तर अफसाना सुनते सुनाते
पसर कर बेबसी के कांटे यूं जीभ लपलपाते
रात बहुत हो चली ओढ़ लूँ ज़िंदगी सोते साते
मंज़र की कशिश किस कदर हो चली दिलचस्प
स्याह आसमानों पर मुट्ठी भर कहकशां बिखेर जाते
सहरा की रेत को खुद प्यास नहीं लगती
पीने पे उतर आएं तो समंदर को भी पी जाते
अरुणाई की तरुणाई ग़र्क होने को है चली
बिखेर दी सब लाली इस बार जाते जाते

जब गुठली गिरे कहीं उसकी, तो वृक्ष एक और लग जाए

जब गुठली गिरे कहीं उसकी, तो वृक्ष एक और लग जाए

वक़्त यूँ गुज़र रहा, जैसे ठंडी हवा का हो झोंका
कुछ कर जा इस पल में, किसने है तुझे रोका

ऐसा वृक्ष लगा धरा में, फल जिसका सदियां खाएं
जब गुठली गिरे कहीं उसकी, तो वृक्ष एक और लग जाए

ये ना सोच क्या करना है आज, बैठे बैठे मुझसे जुड़ जा
सिर्फ समझना शुरू कर, और बैठे बैठे ही बढ़ जा

वृक्ष ऐसा बो आज तू, जो पीपल बरगद जैसा हो
जीवन को जो कायम रखे, जीवन अपना वैसा हो

ऐसा पंछी बन जा तू, जो गुठली साथ ले उड़ता है
जहां जहां जब डेरा डाले, वृक्ष वहीँ पर बढ़ता है

अपना दल बल मिशन ग्रीन है, दल में तू भी आजा ना
निर्बल को भी जीवंत कर दे, ऐसा बल दिखलाजा ना

पुनीत वर्मा, मिशन ग्रीन दिल्ली कम्युनिटी मिशन ग्रीन ग्रुप के साथ जुड़ने के लिए 9910162399 पर व्हाट्सप्प करें

Khoj Raha Hun Ratno ko, Pune ke Darbaar Mein

Khoj Raha Hun Ratno ko, Pune ke Darbaar Mein

जीवन की यात्रा में, इस शहर ने बुलाया है
दिल्ली के इस बालक को, खिलाया है पिलाया है
दरख्तों की ओट ने, लवासा की बोट ने
मोहित कर डाला मुझको, मराठाओं के फोर्ट ने

धीरज से चलते चलते, सीमाओं को बदलते बदलते
आज यहां पहुंचा हूं, भारत में टहलते टहलते
अमित इस संसार में, स्वप्नाली पूर्ण भंडार में
खोज रहा हूँ रत्नों को, पुणे के दरबार में

शशि तले बैठा हूँ आज, गिन रहा इन तारों को
नमन कर रहा इस निकिता को, जन्मा जिसने हज़ारों को
विजय पताका लहराने वाले, मराठा ध्वज फहराने वाले
उन वीरों से प्रेरित हो रहा, जो थे दुश्मन को हिलाने वाले

झुकता हूँ हे श्रीनाथ, पूजा मैं करता हूँ
तेरे इस शहर को, नमन मैं करता हूँ
तरण की अप्सरा से, जैसे
मुलाकात सी हो गयी
पुणे की इस धरती से, गहरी बात सी हो गयी

विचारों से अविज्ञान हो रहा, महाराष्ट्र में हूँ खो रहा
कविता के जरिये सलाम करता हू ,सभी को प्रणाम करता हूँ

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