कल्च से मैं परेशान हुआ

ब्रेक से हर पल पैर हटाकर, कल्च से मैं परेशान हुआ  – रोड पे अपना समय गवांकर, देखो मैं बेजान हुआ
कार को अपनी रेस्ट दिला कर, देखो दिल्ली जाग रही है  – जल्दी जल्दी पकड़ लो उसको, दिल्ली मेट्रो भाग रही है
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स्मार्ट कार्ड से जीवन सुधरा, शहर का अपने ज्ञान हुआ  – दांडी मार्च का असर हुआ वो, देखो मैं बलवान हुआ
मिशन ग्रीन की चिंगारी से, सुलग सुहानी आग रही  है – कार को अपनी रेस्ट दिला कर, देखो दिल्ली जाग रही है
जल्दी जल्दी पकड़ लो उसको, दिल्ली मेट्रो भाग रही है

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स्टेशन पर मुलाकात हुई है, नए पुराने यारों की  – मिलकर हमने जश्न मनाया, बात बनी है प्यारों की
मिशन ग्रीन की भागीदारी , दिल्ली मुघसे मांग रही है – कार को अपनी रेस्ट दिला कर, देखो दिल्ली जाग रही है
जल्दी जल्दी पकड़ लो उसको, दिल्ली मेट्रो भाग रही है

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Aajaadi Kaa Ab Jashn Manaa Lo

सुनकर बहती नदिया को , संवाद करो किनारों से  – अज्नाबिओं को गले लगाकर, स्वागत करो बहारों से
आजादी का अब जश्न मना लो,  सबको अपना आज बना लो  – कुछ पल अपनी बुद्धि को, आजाद करो विचारों से
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पल पल मरती पिंजरे में , चिडिया आज बरी हुई है  – दुनिया के इस नक्शे पर , दिल्ली अपनी हरी हुई है
मुग़ल काल के स्मारक छुकर ,  बात करो मीनारों से  – आजादी का अब जश्न मना लो,  सबको अपना आज बना लो
कुछ पल अपनी बुद्धि को, आजाद करो विचारों से
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आज तिरंगा दिल में देखो, कुछ पल खुद के साथ बिताकर – अपना जीवन सफल करो अब, कुछ पल उसपर प्यार जताकर
मुख पर सबके पुष्प खिलाओ, कविता  की फुहारों से  – आजादी का अब जश्न मना लो,  सबको अपना आज बना लो
कुछ पल अपनी बुद्धि को, आजाद करो विचारों से

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बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे

 

मौसम का अंदाज है बदला, गर्म हवा को छोड़ के पीछे – टिप टिप पानी उस पर बरसा, पीपल है जो मोड़ के पीछे
देखो काली घटा के पीछे, चमक रहा है दिनकर ऐसे – बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे
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बूँद बूँद को मुख से पीती, प्यासी धरती सुखी हुई अब – आसमान को ताक़ रही है, नजर हमारी झुकी हुई अब
वृक्ष के पीले पतों को, तोड़ रहा हो चुनकर जैसे – देखो काली घटा के पीछे, चमक रहा है दिनकर ऐसे
बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे
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पूरब पश्चिम हर दिशा में, आज बजी है कैसी सरगम – दिल्ली की इन् सड़कों पर, कोयल कूक रही है हरदम
क़ुदरत के इन फूलों को , जोड़ रहा हो बुनकर जैसे – देखो काली घटा के पीछे, चमक रहा है दिनकर ऐसे
बारिश की इन बूंदों को , बाँट रहा हो गिनकर जैसे

By Puneet Verma – puneet6565@gmail.com

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